IAS अधिकारी ने MP के दिग्गज मंत्री पर लगाए धमकी और अभद्रता के आरोप, अब CM तक पहुंचा मामला, सियासी हलचल तेज

Edited By Himansh sharma, Updated: 28 Apr, 2026 10:51 AM

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मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक मामला खासा चर्चा में है

जबलपुर: मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक मामला खासा चर्चा में है, जहां सत्ता और सिस्टम आमने-सामने नजर आए। लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह और जबलपुर स्मार्ट सिटी के सीईओ व आईएएस अधिकारी अरविंद शाह के बीच उपजा विवाद अब केवल व्यक्तिगत टकराव नहीं, बल्कि मंत्री बनाम नौकरशाही की बहस का रूप ले चुका है। मामले की शुरुआत तब हुई जब मार्च में पदभार संभालने के बाद अरविंद शाह ने स्मार्ट सिटी कार्यालय में सख्ती बढ़ाई। कर्मचारियों की उपस्थिति की जांच कराई गई, जिसमें कई कर्मचारी अनुपस्थित पाए गए। इनमें दिलप्रीत कौर भल्ला का नाम भी शामिल था। जवाब न मिलने पर वेतन रोकने की कार्रवाई की गई, जिससे असंतोष बढ़ा। बताया गया कि इसी शिकायत को लेकर मामला मंत्री राकेश सिंह तक पहुंचा।

आईएएस अधिकारी अरविंद शाह का आरोप है कि मंत्री ने उन्हें अपने बंगले पर बुलाकर अभद्र भाषा का प्रयोग किया, चयन पर सवाल उठाए और धमकी भी दी। इस घटना से आहत होकर उन्होंने आईएएस एसोसिएशन से औपचारिक शिकायत की। मामला गंभीर हुआ तो सोमवार को यह शिकायत सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक पहुंची। मुख्यमंत्री ने तत्परता दिखाते हुए मंत्री राकेश सिंह और आईएएस एसोसिएशन के पदाधिकारियों को आमने-सामने बुलाया। बंद कमरे में हुई बातचीत के बाद मुख्यमंत्री ने दोनों पक्षों को समन्वय और मर्यादा के साथ काम करने की सलाह दी, जिसके बाद फिलहाल विवाद को शांत मान लिया गया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। शाम होते-होते एक नया मोड़ सामने आया, जब दिलप्रीत कौर भल्ला का शपथ-पत्र सार्वजनिक हुआ। इसमें उन्होंने सीईओ अरविंद शाह पर गंभीर आरोप लगाए। भल्ला ने मुख्यमंत्री को संबोधित पत्र में लिखा कि वेतन भुगतान को लेकर जब उन्होंने शिकायत की, तब शाह ने उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया, उन्हें ‘दो कौड़ी’ तक कहा और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।

पत्र में यह भी दावा किया गया कि इसी व्यवहार के बाद मंत्री राकेश सिंह ने वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में शाह को महिला कर्मचारियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने की नसीहत दी थी। इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या यह केवल अनुशासन बनाम राजनीतिक हस्तक्षेप का मामला है, या फिर प्रशासनिक सख्ती और मानवीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन बिगड़ गया? मंत्री और आईएएस अधिकारी दोनों ही अपनी-अपनी स्थिति में सही ठहरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती शासन व्यवस्था की साख बनाए रखने की है।

फिलहाल मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से मामला शांत जरूर हुआ है, लेकिन यह विवाद एक बार फिर यह याद दिलाता है कि सत्ता और प्रशासन के बीच संवाद जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है मर्यादा और पारदर्शिता। क्योंकि जब मंत्री और अफसर आमने-सामने खड़े हो जाते हैं, तो सवाल केवल व्यक्ति का नहीं, पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का बन जाता है।

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