Edited By Himansh sharma, Updated: 27 Apr, 2026 03:19 PM

मध्यप्रदेश में लंबे समय से लंबित पड़े निगम-मंडल, आयोग और प्राधिकरणों में नियुक्तियों ने अब तेजी पकड़ ली है।
भोपाल। मध्यप्रदेश में लंबे समय से लंबित पड़े निगम-मंडल, आयोग और प्राधिकरणों में नियुक्तियों ने अब तेजी पकड़ ली है। हालिया आदेशों पर नजर डालें तो स्पष्ट संकेत मिलता है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार इन नियुक्तियों को केवल प्रशासनिक भरपाई के रूप में नहीं देख रही, बल्कि इसके जरिए सूक्ष्म राजनीतिक संतुलन साधने की रणनीति पर काम कर रही है।इन नियुक्तियों में ग्वालियर-चंबल क्षेत्र सबसे ज्यादा चर्चा में है, जहां विभिन्न गुटों और प्रभावशाली नेताओं के समीकरणों को बेहद सावधानी से साधा गया है। भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि संगठन, संघ, क्षेत्रीय नेतृत्व और पुराने राजनीतिक सहयोगियों—सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने की नीति पर सरकार काम कर रही है।
केपी यादव की नियुक्ति से बड़ा राजनीतिक संकेत
सबसे अधिक चर्चा सिविल सप्लाईज कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष पद पर केपी यादव की नियुक्ति को लेकर है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराकर राजनीतिक हलकों में बड़ी पहचान बनाई थी। बाद में सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद भी दोनों नेताओं के बीच संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे।2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने केपी यादव का टिकट काटकर ज्योतिरादित्य सिंधिया को उम्मीदवार बनाया, लेकिन इसके बावजूद यादव ने पार्टी लाइन से बाहर जाकर विरोध नहीं किया। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही कि केंद्रीय नेतृत्व, खासकर अमित शाह ने उन्हें भविष्य में बड़ी जिम्मेदारी का संकेत दिया था। अब उनकी यह नियुक्ति उसी राजनीतिक संतुलन का हिस्सा मानी जा रही है।
ग्वालियर-चंबल में गुटीय संतुलन की बारीक बुनावट
ग्वालियर विकास प्राधिकरण की कमान मधुसूदन भदौरिया को सौंपी गई है, जिन्हें संघ पृष्ठभूमि का मजबूत चेहरा माना जाता है। भाजपा संगठन में महामंत्री रह चुके भदौरिया की नियुक्ति को संघ और संगठन के प्रतिनिधित्व के रूप में देखा जा रहा है।
वहीं उपाध्यक्ष पद पर सुधीर गुप्ता को सिंधिया समर्थक और वेद प्रकाश शिवहरे को नरेंद्र सिंह तोमर खेमे से जुड़े नेता के रूप में स्थान मिला है। इसी तरह अशोक जादौन को ग्वालियर मेला प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया है, जिन्हें विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर का करीबी माना जाता है, जबकि उदयवीर सिंह गुर्जर को उपाध्यक्ष बनाया गया है।
पुराने चेहरे और नए संतुलन का मेल अशोक शर्मा को ग्वालियर विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया है। वे पहले कांग्रेस में सक्रिय रहे और बाद में भाजपा में शामिल हुए। उन्हें सिंधिया खेमे से जोड़कर देखा जाता है। इसके अलावा पूर्व विधायक रामनिवास रावत की नियुक्ति भी राजनीतिक दृष्टि से अहम मानी जा रही है। लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा में शामिल हुए रावत को पहले मंत्री पद मिला था, लेकिन उपचुनाव में हार के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा था। अब उन्हें वन विकास निगम लिमिटेड का अध्यक्ष बनाया गया है। उन्हें मुख्यमंत्री मोहन यादव के करीबी नेताओं में गिना जाता है।
‘सबको साथ लेकर चलने’ की स्पष्ट रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन नियुक्तियों के जरिए भाजपा ने स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी किसी एक गुट या समूह तक सीमित नहीं रहना चाहती। संघ, संगठन, सिंधिया समर्थक, तोमर खेमे के साथ-साथ नए और पुराने सभी सहयोगियों को साधते हुए एक व्यापक संतुलन की कोशिश की गई है। मध्यप्रदेश की राजनीति में इन नियुक्तियों को आने वाले समय की बड़ी रणनीतिक तैयारी के रूप में देखा जा रहा है, जहां सत्ता और संगठन के बीच संतुलन साधते हुए चुनावी समीकरणों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।