Edited By meena, Updated: 06 Jan, 2026 12:31 PM

भारत की आज़ादी के बाद लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए हुए शुरुआती जनआंदोलनों में छत्तीसगढ़ के छुईखदान का नाम इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। 9 जनवरी 1953 वह दिन जब शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों
खैरागढ़ (हेमंत पाल) : भारत की आज़ादी के बाद लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए हुए शुरुआती जनआंदोलनों में छत्तीसगढ़ के छुईखदान का नाम इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। 9 जनवरी 1953 वह दिन जब शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों की आवाज़ को गोलियों से दबा दिया गया। तहसील समाप्त किए जाने के विरोध में सड़कों पर उतरे निहत्थे नागरिकों पर हुई गोलीबारी में 5 लोगों ने मौके पर ही शहादत दी, जबकि 24 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। यह घटना आज भी छुईखदान की सामूहिक स्मृति में ‘काले दिन’ के रूप में दर्ज है।
तहसील खत्म करने का फैसला बना जनआक्रोश की वजह
रियासतों के विलीनीकरण के बाद 1 जनवरी 1948 को तत्कालीन सीपी एंड बरार राज्य के दुर्ग जिले में दुर्ग, राजनांदगांव, खैरागढ़, कवर्धा, बेमेतरा, बालोद और छुईखदान कुल सात तहसीलें अस्तित्व में थीं। लेकिन दिसंबर 1952 में सरकार ने अचानक छुईखदान तहसील को समाप्त करने का निर्णय लिया। यह फैसला सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं था, बल्कि क्षेत्र की पहचान, सुविधा और भविष्य पर सीधा प्रहार था। नतीजतन, पूरे इलाके में व्यापक जनआंदोलन खड़ा हो गया।
शांतिपूर्ण आंदोलन पर गोलियां, लोकतंत्र हुआ लहूलुहान
9 जनवरी 1953 को आंदोलन अपने चरम पर था। लोग शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें रख रहे थे, लेकिन हालात अचानक बदल गए। प्रशासनिक दमन में चली गोलियों ने लोकतंत्र को शर्मसार कर दिया। पांच नागरिकों की शहादत ने छुईखदान को ऐसा जख्म दिया, जो आज 73 साल बाद भी हरा है।
जांच आयोग बना, लेकिन न्याय अधूरा रह गया
घटना की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन नागपुर हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बी.के. चौधरी की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया गया। वहीं, उस समय के नेता प्रतिपक्ष ठाकुर प्यारेलाल ठाकुर ने तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के खिलाफ विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया। हालांकि यह प्रस्ताव ध्वनिमत से अस्वीकृत हो गया और न ही दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई हुई। शहीदों के परिजनों और क्षेत्रवासियों को न्याय की आस अधूरी ही रह गई।
73 साल बाद भी वही सवाल, वही पीड़ा
आज़ादी के बाद जिस लोकतंत्र और विकास की उम्मीद में छुईखदान के लोगों ने संघर्ष किया था, वह सपना आज भी अधूरा प्रतीत होता है। क्षेत्र के लोग मानते हैं कि इतिहासिक उपेक्षा आज भी जारी है चाहे वह प्रशासनिक दर्जा हो, बुनियादी सुविधाएं हों या समग्र विकास।
9 जनवरी 2026: श्रद्धांजलि के साथ संघर्ष का संकल्प
हर वर्ष की तरह इस बार भी 9 जनवरी 2026 को छुईखदान में शहीद दिवस मनाया जाएगा। शहीद गार्डन, छुईखदान में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में 5 शहीदों को नमन किया जाएगा। 5100 दीप प्रज्वलित कर बलिदान को याद किया जाएगा। इसके साथ ही, छुईखदान विकासखंड के समग्र विकास, ऐतिहासिक उपेक्षा के विरोध और प्रशासनिक अधिकारों की मांग को लेकर नए जनआंदोलन की औपचारिक शुरुआत का ऐलान भी किया जाएगा।
इतिहास और वर्तमान के बीच खड़ा छुईखदान
छुईखदान की धरती एक बार फिर इतिहास और वर्तमान को जोड़ते हुए सवाल कर रही है कि क्या शहीदों को कभी पूरा न्याय मिलेगा? और क्या जिस विकास, सम्मान और अधिकार के लिए उन्होंने जान दी, वह सपना कभी साकार होगा?