अफसर ने उतरवाई थी वर्दी… 26 साल बाद उसी वर्दी में लौटे हवलदार, बीच के 20 साल संत बनकर गुजारे!

Edited By Himansh sharma, Updated: 02 Sep, 2026 04:26 PM

26 year fight ends crpf havaldar reclaims his uniform

कुछ कहानियां सिर्फ नौकरी पाने या खोने की नहीं होतीं, बल्कि हक, हौसले और इंतजार की मिसाल बन जाती हैं।

मुरैना। कुछ कहानियां सिर्फ नौकरी पाने या खोने की नहीं होतीं, बल्कि हक, हौसले और इंतजार की मिसाल बन जाती हैं। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के गिरवरसिंह तोमर की कहानी भी ऐसी ही है। सीआरपीएफ में हवलदार रहते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी से हुए विवाद के बाद उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और करीब 26 वर्षों तक अदालत में अपने अधिकार की लड़ाई लड़ते रहे।

इस लंबे संघर्ष के दौरान उन्होंने परिवार का पेट पालने के लिए मजदूरी भी की और मुरैना के गुफा मंदिर में संत के रूप में करीब दो दशक तक सेवा की। मंदिर में उन्हें गिरवरदास महाराज के नाम से जाना जाने लगा। अब अदालत से जीत के बाद वही संत एक बार फिर अपना चोला छोड़कर सीआरपीएफ की वर्दी में लौट आया है। हाल ही में विभाग ने उन्हें दोबारा सेवा में लेने का आदेश जारी किया है और उनकी पोस्टिंग छत्तीसगढ़ के बीजापुर में की गई है।

देश सेवा के जुनून ने पहुंचाया सीआरपीएफ तक

मुरैना जिले के छिछावली गांव निवासी गिरवरसिंह तोमर को बचपन से ही देश सेवा का जुनून था। इसी सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने कम उम्र से ही सेना में भर्ती की तैयारी शुरू कर दी थी। मेहनत रंग लाई और वर्ष 1991 में उनका चयन सीआरपीएफ में हवलदार के पद पर हो गया।

करीब आठ वर्षों तक उन्होंने सेवा की। नौकरी में उनका प्रदर्शन भी अच्छा रहा और प्रमोशन की उम्मीद बन रही थी। इसी दौरान वर्ष 1999 की शुरुआत में एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ किसी बात को लेकर उनकी कहासुनी हो गई। गिरवरसिंह का कहना है कि वह अपनी बात को सही मानते थे, इसलिए उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। विवाद बढ़ा तो पहले उन्हें निलंबित किया गया और विभागीय कार्रवाई के बाद 21 अक्टूबर 1999 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

नौकरी गई तो टूट गया परिवार का सहारा

बर्खास्तगी का असर सिर्फ गिरवरसिंह पर नहीं पड़ा, बल्कि पूरा परिवार आर्थिक संकट में आ गया। कुछ समय तक उन्होंने खुद को घर तक सीमित रखा। बाद में रोजी-रोटी के लिए गांव से बाहर जाकर मजदूरी भी की। हालांकि, नौकरी छूटने का दर्द उनके भीतर बना रहा। उनका कहना है कि उन्हें सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात की थी कि जिस सेवा को उन्होंने देश के लिए चुना था, उससे उन्हें इस तरह अलग कर दिया गया।

मंदिर में मिली नई पहचान, लेकिन पुराना संघर्ष जारी रहा

मानसिक तनाव और परिस्थितियों से जूझते हुए गिरवरसिंह अपने गांव से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित बारहद्वारी मंदिर पहुंच गए। वहां उन्होंने कई वर्षों तक समय बिताया। इसके बाद करीब 20 वर्ष पहले उन्होंने मुरैना के प्रसिद्ध गुफा मंदिर में शरण ली। मंदिर में रहते हुए उन्होंने पूजा-पाठ, सेवा और धार्मिक कार्यों में खुद को लगा दिया। यहां मंदिर के मुख्य पुजारी ने उन्हें गिरवरदास महाराज नाम दिया। धीरे-धीरे वह मंदिर की सेवा का हिस्सा बन गए और संत के रूप में उनकी पहचान बन गई। लेकिन संत का जीवन अपनाने के बावजूद सीआरपीएफ में वापस लौटने की उनकी इच्छा खत्म नहीं हुई।

1999 में शुरू हुई कानूनी लड़ाई, 2025 में मिली बड़ी जीत

बर्खास्तगी के खिलाफ गिरवरसिंह ने वर्ष 1999 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। करीब आठ वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद वर्ष 2007 में फैसला उनके पक्ष में आया। हालांकि, इसके बाद विभाग की ओर से आगे की कानूनी कार्रवाई के कारण मामला फिर लंबा खिंच गया।

गिरवरसिंह ने हार नहीं मानी और मामले को आगे चुनौती दी। लंबे इंतजार के बाद 28 अगस्त 2025 को हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सीआरपीएफ को उन्हें दोबारा सेवा में लेने के निर्देश दिए।अदालत के आदेश के बावजूद ज्वाइनिंग की प्रक्रिया में देरी हुई। बताया गया कि 26 वर्ष पुराने मामले की फाइल और रिकॉर्ड तलाशने में विभाग को समय लगा। इसके बाद लगातार कानूनी प्रयासों के बीच आखिरकार विभाग ने 26 अगस्त को गिरवरसिंह को दोबारा सेवा में लेने का आदेश जारी कर दिया।

संत का चोला उतारा, फिर पहन ली सीआरपीएफ की वर्दी

वर्षों तक मंदिर में संत के रूप में रहने वाले गिरवरदास महाराज के लिए वह दिन भावुक कर देने वाला था, जब उन्हें फिर से सीआरपीएफ की वर्दी पहनने का मौका मिला। एक ओर मंदिर से विदाई का भाव था तो दूसरी ओर वर्षों पुराने सपने के पूरा होने की खुशी। अब वह दोबारा सरकारी सेवा में हैं और उनकी पोस्टिंग छत्तीसगढ़ के बीजापुर में हुई है।

अब प्रमोशन के हक के लिए लड़ेंगे

गिरवरसिंह का कहना है कि अगर उनकी सेवा बीच में नहीं रोकी जाती तो इन 26 वर्षों में वह कई पदोन्नतियां पा चुके होते। इसलिए नौकरी में वापसी के बाद उनकी अगली लड़ाई अपने प्रमोशन और उससे जुड़े सेवा लाभों को लेकर होगी। उनका कहना है कि वह आगे भी कानूनी रास्ते से अपने अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे।

परिवार को संभालते हुए बच्चों को भी पढ़ाया

लंबे संघर्ष के बीच गिरवरसिंह ने परिवार की जिम्मेदारियों से भी मुंह नहीं मोड़ा। मंदिर में सेवा करते हुए उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया।उनकी पत्नी मंजू देवी हैं। परिवार में दो बेटियां शिवानी और राधा तथा दो बेटे अभिषेक और कृष्णा हैं। दोनों बेटियों का विवाह हो चुका है। बड़ा बेटा अभिषेक एयरफोर्स में जवान है, जबकि छोटा बेटा पढ़ाई कर रहा है और वह भी भविष्य में देश सेवा से जुड़ना चाहता है।

मंदिर प्रबंधन ने कहा- आखिर तपस्या सफल हुई

गुफा मंदिर के महामंडलेश्वर शिवशरण महाराज महंत के मुताबिक, गिरवरदास महाराज ने करीब 20 साल तक मंदिर में रहकर सेवा की। वह नियमित पूजा-पाठ करते और मंदिर के कार्यों में सहयोग देते थे। महंत के अनुसार, गिरवरदास अक्सर अपने पुराने सीआरपीएफ जीवन और चल रहे मुकदमे का जिक्र करते थे। अदालत की तारीखों पर जाने के दौरान भी उन्हें अपने मामले की चिंता रहती थी। मंदिर प्रबंधन उनके देश सेवा के जज्बे और संघर्ष से परिचित था।

अब जब उन्हें दोबारा वर्दी मिल गई है, तो मंदिर से जुड़े लोग इसे उनके वर्षों के संघर्ष का परिणाम मान रहे हैं।

26 साल तक अदालत में लड़ाई, करीब 20 साल संत के रूप में सेवा और आखिर में उसी वर्दी में वापसी—गिरवरसिंह तोमर की कहानी इस बात की मिसाल है कि लंबा इंतजार भी उस इंसान का हौसला नहीं तोड़ सकता, जिसने अपने अधिकार के लिए आखिरी दम तक लड़ने का फैसला कर लिया हो।

Related Story

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!