High Court का बड़ा फैसला: पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे को उम्रकैद की सजा

Edited By Himansh sharma, Updated: 06 Apr, 2026 12:23 PM

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छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में लंबे इंतजार के बाद बड़ा न्यायिक फैसला सामने आया है।

रायपुर: छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में लंबे इंतजार के बाद बड़ा न्यायिक फैसला सामने आया है। Chhattisgarh High Court ने पूर्व मुख्यमंत्री Ajit Jogi के बेटे Amit Jogi को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि समान साक्ष्य होने पर किसी भी आरोपी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। यह फैसला चीफ जस्टिस Ramesh Sinha और जस्टिस Arvind Kumar Verma की स्पेशल डिवीजन बेंच ने सुनाया। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब सभी आरोपियों पर एक ही प्रकार के आरोप और साक्ष्य मौजूद हों, तो किसी एक को अलग से राहत देना उचित नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसके पक्ष में कोई ठोस और अलग कारण न हो।

क्या है मामला

4 जून 2003 को राजधानी Raipur में एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस केस में कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया गया था। जांच के दौरान दो आरोपी सरकारी गवाह बन गए, जबकि बाकी पर मुकदमा चला। शुरुआत में 2007 में रायपुर की विशेष अदालत ने Amit Jogi को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। इसके बाद पीड़ित पक्ष के परिजन Satish Jaggi ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला आगे बढ़ता गया।

CBI जांच और अपील

मामले की गंभीरता और शुरुआती जांच पर उठे सवालों के चलते राज्य सरकार ने जांच Central Bureau of Investigation (CBI) को सौंप दी थी। CBI ने अपनी जांच में कई लोगों के खिलाफ हत्या और साजिश के आरोप लगाए। इसके बाद Supreme Court of India में भी अपील की गई, जिसके बाद मामला पुनः हाईकोर्ट भेजा गया ताकि विस्तृत सुनवाई हो सके।

हाईकोर्ट का अहम निर्णय

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि समान साक्ष्यों के आधार पर एक आरोपी को बरी करना और अन्य को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है, जब तक कि उसके लिए अलग और स्पष्ट कारण न दिए जाएं। कोर्ट ने इसी आधार पर Amit Jogi को IPC की धारा 302 और 120-B के तहत दोषी मानते हुए उम्रकैद और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना न भरने पर अतिरिक्त सजा भी भुगतनी होगी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला छत्तीसगढ़ की राजनीति और न्यायिक इतिहास के सबसे चर्चित हत्याकांडों में से एक रहा है। वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई, अलग-अलग अदालतों के फैसले और जांच एजेंसियों की भूमिका के कारण यह केस लगातार सुर्खियों में बना रहा। अब हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर यह मामला चर्चा में है और इसे न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

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