Edited By Himansh sharma, Updated: 16 May, 2026 01:02 PM

मध्य प्रदेश के दमोह में उच्च शिक्षा एवं जिले के प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार के हालिया दौरे ने एक बार फिर सरकारी तंत्र में सादगी और मितव्ययिता के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दमोह: मध्य प्रदेश के दमोह में उच्च शिक्षा एवं जिले के प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार के हालिया दौरे ने एक बार फिर सरकारी तंत्र में सादगी और मितव्ययिता के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार ईंधन बचाने और संसाधनों के सीमित उपयोग की अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर वीआईपी काफिलों की तस्वीरें इन अपीलों को चुनौती देती नजर आती हैं।
सूत्रों और मौके पर मौजूद रिपोर्टिंग के अनुसार, दमोह कलेक्ट्रेट से सर्किट हाउस तक मंत्री के काफिले में करीब 15 वाहन शामिल थे। वहीं सर्किट हाउस पहुंचने के बाद यह संख्या कथित तौर पर 40 से अधिक तक पहुंच गई, जिससे प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चर्चित पहलू तब सामने आया जब पत्रकारों ने काफिले की बढ़ती संख्या और सरकारी सादगी के दावों पर सवाल उठाए। बताया जाता है कि इस पर मंत्री की प्रतिक्रिया में स्पष्टता की बजाय जिम्मेदारी को अन्य वाहनों और कार्यकर्ताओं पर डालने की बात सामने आई, जबकि स्वयं के पास सीमित वाहनों की बात कही गई।
यह स्थिति एक बड़े सवाल को जन्म देती है—क्या सरकारी पदों पर बैठे जिम्मेदार लोग वास्तव में उन्हीं नीतियों और अपीलों का पालन कर रहे हैं, जिनकी अपेक्षा वे जनता से करते हैं?
एक तरफ सरकारें बार-बार मितव्ययिता, पारदर्शिता और जनधन के सही उपयोग की बात करती हैं, वहीं दूसरी तरफ वीआईपी काफिलों का यह विस्तार आम जनता के बीच असहजता और आलोचना का कारण बनता है। यह केवल वाहनों की संख्या का मुद्दा नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जो सत्ता और जनता के बीच दूरी को और गहरा करती है। दमोह की यह घटना एक बार फिर इस बहस को जीवित कर देती है कि क्या वीआईपी संस्कृति पर वास्तव में नियंत्रण की आवश्यकता है या यह सिर्फ भाषणों और अपीलों तक ही सीमित रह जाएगी।