MP में सरकार के लिए मुसीबत बने कई मंत्री! मंत्रिमंडल विस्तार में छिन सकता है इन दिग्गजों का पद, देखें नाम

Edited By Himansh sharma, Updated: 31 May, 2026 12:41 PM

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मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव सरकार के ढाई साल पूरे होने के साथ ही सत्ता और संगठन के भीतर एक बड़ा मंथन शुरू हो गया है।

भोपाल। मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव सरकार के ढाई साल पूरे होने के साथ ही सत्ता और संगठन के भीतर एक बड़ा मंथन शुरू हो गया है। विपक्ष के हमलों से ज्यादा सरकार इन दिनों अपने ही मंत्रियों के विवादित बयानों, कार्यशैली और आपसी टकरावों से घिरी नजर आ रही है। हालात ऐसे हैं कि कई मंत्रियों के बयान न सिर्फ प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी सुर्खियां बने और सरकार की किरकिरी का कारण बने। बीजेपी संगठन के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि सरकार की उपलब्धियों पर मंत्रियों के विवाद भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं के बीच कुछ मंत्रियों की छुट्टी और कुछ नए चेहरों की एंट्री की अटकलें भी तेज हो गई हैं।

सबसे बड़ा विवाद जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह से जुड़ा रहा। कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर की गई उनकी टिप्पणी ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया। मामला अदालतों तक पहुंच गया और सरकार को भी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। वहीं नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी कई मौकों पर अपने बयानों को लेकर विवादों में रहे। इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों के दौरान पत्रकारों से हुई उनकी तीखी प्रतिक्रिया विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा बन गई।

राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आरोपों ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ाईं। मामला अदालत तक पहुंच चुका है और विपक्ष लगातार इस मुद्दे को हवा दे रहा है।कृषि मंत्री एदल सिंह कंषाना का "रेत माफिया नहीं, पेट माफिया" वाला बयान भी चर्चा में रहा। ऐसे समय में जब अवैध खनन को लेकर सरकार पहले से सवालों के घेरे में है, इस बयान ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया।

अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री नागर सिंह चौहान और लोक स्वास्थ्य मंत्री संपतिया उइके के बीच सार्वजनिक रूप से सामने आया टकराव भी सरकार के लिए चिंता का विषय बना। दोनों मंत्रियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने यह संदेश दिया कि सरकार के भीतर समन्वय की कमी है।

सूत्रों की मानें तो हाल ही में हुई सत्ता-संगठन की शीर्ष बैठक में मंत्रियों के प्रदर्शन के साथ-साथ उनके व्यवहार और सार्वजनिक छवि का भी आकलन किया गया। राष्ट्रीय नेतृत्व तक प्रदेश के विवादों की रिपोर्ट पहुंच चुकी है और यही कारण है कि संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को केवल राजनीतिक संतुलन नहीं बल्कि अनुशासन और प्रदर्शन से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ मंत्रियों की बयानबाजी और आंतरिक खींचतान पर नियंत्रण रखना है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो विपक्ष को सरकार पर हमला करने के लिए किसी बड़े मुद्दे की जरूरत नहीं पड़ेगी। आने वाले दिनों में होने वाला मंत्रिमंडल विस्तार केवल नए चेहरों की एंट्री भर नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि बीजेपी नेतृत्व विवादों को कितना गंभीरता से ले रहा है। सत्ता के गलियारों में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या विवादित मंत्रियों पर गिरेगी गाज या फिर उन्हें एक और मौका मिलेगा?

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