MP के प्रसिद्ध खिलाड़ी का निधन, पद्मश्री सम्मान से पहले ली अंतिम सांस, CM ने जताया शोक

Edited By Himansh sharma, Updated: 19 Apr, 2026 02:43 PM

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मध्य प्रदेश की पारंपरिक युद्ध कला और बुंदेली मार्शल आर्ट को देश-दुनिया में पहचान दिलाने वाले वरिष्ठ अखाड़ा गुरु भगवानदास रैकवार का शनिवार रात निधन हो गया।

सागर। मध्य प्रदेश की पारंपरिक युद्ध कला और बुंदेली मार्शल आर्ट को देश-दुनिया में पहचान दिलाने वाले वरिष्ठ अखाड़ा गुरु भगवानदास रैकवार का शनिवार रात निधन हो गया। 83 वर्ष की उम्र में उन्होंने भोपाल स्थित एम्स में अंतिम सांस ली। उनके निधन से खेल, संस्कृति और बुंदेलखंड की लोक परंपरा से जुड़े लोगों में शोक की लहर है।भगवानदास रैकवार ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा बुंदेलखंड की प्राचीन युद्ध कला ‘अखाड़ा’ को बचाने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में समर्पित कर दिया। सागर जिले में 2 जनवरी 1944 को जन्मे रैकवार ने 10वीं तक पढ़ाई के बाद बैंक में नौकरी शुरू की थी, लेकिन पारंपरिक युद्ध कला के प्रति गहरे लगाव के चलते करीब 20 साल बाद सरकारी नौकरी छोड़ दी।


इसके बाद उन्होंने ‘छत्रसाल अखाड़े’ की जिम्मेदारी संभाली और युवाओं को लाठी, तलवार, भाला, त्रिशूल जैसी पारंपरिक युद्ध कलाओं का प्रशिक्षण देना शुरू किया। बताया जाता है कि उन्होंने अपने जीवन में करीब 20 हजार युवाओं को प्रशिक्षित किया। उनकी कला का प्रदर्शन रूस, अमेरिका और सिंगापुर जैसे देशों तक पहुंचा, जिससे बुंदेली मार्शल आर्ट को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
भगवानदास रैकवार अपनी लाठी कला के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। वे कहा करते थे कि केवल एक लाठी के सहारे एक व्यक्ति दर्जनों लोगों का सामना कर सकता है। अखाड़े में वे स्वयं एक साथ 10 से 12 लोगों से मुकाबला कर इस बात को साबित भी करते थे।

उनके इस असाधारण योगदान को देखते हुए केंद्र सरकार ने इसी वर्ष 25 जनवरी को उन्हें पद्मश्री सम्मान के लिए चुना था। कुछ ही महीनों बाद राष्ट्रपति के हाथों उन्हें यह सम्मान मिलने वाला था, लेकिन उससे पहले ही उनका निधन हो गया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि बुंदेली मार्शल आर्ट को वैश्विक पहचान दिलाने वाले और ‘पद्म श्री’ के लिए चयनित भगवानदास रैकवार जी का निधन अत्यंत दुखद है। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति और परिजनों को संबल देने की प्रार्थना की। भगवानदास रैकवार का जाना केवल एक खिलाड़ी का निधन नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की उस जीवंत परंपरा की बड़ी क्षति है, जिसने पीढ़ियों तक शौर्य, अनुशासन और संस्कृति को जीवित रखा।

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