Edited By Himansh sharma, Updated: 13 Jun, 2026 03:11 PM

मध्यप्रदेश की राजनीति और न्यायिक गलियारों में एक बार फिर बीजेपी विधायक एवं खनन कारोबारी संजय पाठक से जुड़ा मामला चर्चा के केंद्र में है।
जबलपुर। मध्यप्रदेश की राजनीति और न्यायिक गलियारों में एक बार फिर बीजेपी विधायक एवं खनन कारोबारी संजय पाठक से जुड़ा मामला चर्चा के केंद्र में है। जबलपुर हाईकोर्ट में चल रहे एक हाई-प्रोफाइल मानहानि प्रकरण की सुनवाई के दौरान जस्टिस विशाल मिश्रा ने स्वयं को मामले से अलग कर लिया। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण उनकी वह टिप्पणी रही, जिसमें उन्होंने कहा कि भविष्य में इस प्रकरण के लिए गठित होने वाली अगली बेंच में भी उन्हें शामिल न किया जाए।
न्यायपालिका में किसी न्यायाधीश द्वारा किसी मामले से स्वयं को अलग करना असामान्य नहीं माना जाता, लेकिन जब ऐसा किसी चर्चित और संवेदनशील मामले में बार-बार हो, तो यह स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न खड़े करता है। खास बात यह है कि इससे पहले भी संजय पाठक से जुड़े एक अन्य मानहानि प्रकरण में जस्टिस विशाल मिश्रा सुनवाई से स्वयं को अलग कर चुके हैं।
क्या है पूरा मामला?
कटनी निवासी पूर्व आर्म्स डीलर नाजिम खान ने विधायक संजय पाठक के खिलाफ एक करोड़ रुपये का मानहानि दावा दायर किया है। विवाद की जड़ उन आरोपों को माना जा रहा है, जिनमें संजय पाठक ने नाजिम खान पर अवैध हथियारों के कारोबार से जुड़े गंभीर आरोप लगाए थे। नाजिम खान का कहना है कि इन आरोपों से उनकी प्रतिष्ठा को गहरा नुकसान पहुंचा, जिसके चलते उन्होंने न्यायालय की शरण ली।
पुराना विवाद फिर चर्चा में
इस मामले के साथ एक पुराना विवाद भी फिर सुर्खियों में आ गया है। पूर्व में आरोप लगे थे कि सुनवाई के दौरान न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से न्यायाधीश से सीधे संपर्क करने का प्रयास किया गया था। उस समय न्यायाधीश द्वारा लिखित शिकायत किए जाने के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए थे। बाद में इस प्रकरण में आपराधिक मामला दर्ज होने की जानकारी भी सामने आई थी।
न्यायपालिका की निष्पक्षता सर्वोपरि
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। ऐसे में किसी प्रभावशाली जनप्रतिनिधि से जुड़े मामले में न्यायाधीश द्वारा स्वयं को अलग करना और भविष्य की बेंचों में भी शामिल न किए जाने की टिप्पणी करना निश्चित रूप से गंभीर संकेत माना जा रहा है।
अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर टिकी हैं कि इस संवेदनशील मामले की सुनवाई के लिए नई बेंच का गठन किस प्रकार किया जाता है। फिलहाल इतना तय है कि संजय पाठक से जुड़ा यह कानूनी विवाद केवल अदालत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीति, न्याय व्यवस्था और जनचर्चा का महत्वपूर्ण विषय बन चुका है।