काम मांगने पहुंचे मजदूरों को रोज लौटाया जा रहा, घोटवानी में मनरेगा पर उठे सवाल

Edited By meena, Updated: 03 Jun, 2026 02:38 PM

laborers seeking work are being turned away daily questions raised over mgnrega

केंद्र और राज्य सरकार जहां मनरेगा के माध्यम से ग्रामीणों को 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देने का दावा कर रही हैं, वहीं दुर्ग जिले के धमधा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत घोटवानी में हकीकत कुछ...

दुर्ग/धमधा (हेमंत पाल) : केंद्र और राज्य सरकार जहां मनरेगा के माध्यम से ग्रामीणों को 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देने का दावा कर रही हैं, वहीं दुर्ग जिले के धमधा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत घोटवानी में हकीकत कुछ और ही नजर आ रही है। यहां रोजगार की उम्मीद लेकर कार्यस्थल पहुंच रहे ग्रामीणों को लगातार दूसरे दिन भी काम नहीं मिल सका, जिससे ग्रामीणों में पंचायत प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भारी नाराजगी देखी जा रही है।

ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत द्वारा गांव में मुनादी कराकर मनरेगा कार्य शुरू होने की जानकारी दी गई थी। सूचना मिलने के बाद बड़ी संख्या में मजदूर सुबह से ही काम करने के लिए पहुंच गए। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें सुबह 10 से 11 बजे तक कार्यस्थल पर बैठाए रखा जाता है, लेकिन बाद में कभी केवाईसी नहीं होने, कभी ऑनलाइन फोटो अपलोड नहीं होने और कभी तकनीकी समस्या का हवाला देकर वापस भेज दिया जाता है।

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ग्रामीणों का आरोप है कि यह स्थिति एक दिन की नहीं बल्कि लगातार दो दिनों से बनी हुई है। मजदूर रोज काम की उम्मीद लेकर पहुंच रहे हैं, लेकिन रोजगार मिलने के बजाय उन्हें बहाने सुनने पड़ रहे हैं। इससे मजदूरों में गहरा आक्रोश है क्योंकि कई परिवारों की रोजी-रोटी मनरेगा मजदूरी पर ही निर्भर है।

मामले को लेकर ग्रामीणों ने रोजगार सहायक सत्यवती कुरै पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब उन्होंने काम नहीं मिलने और नाम सूची में नहीं होने का कारण पूछा तो उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। उल्टा सवाल पूछने पर अभद्र व्यवहार किया गया और वहां से जाने के लिए कह दिया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत में उनकी समस्याओं को सुनने के बजाय उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि मजदूरों का केवाईसी या अन्य दस्तावेजी कार्य लंबित था तो पंचायत को पहले ही इसकी जानकारी देनी चाहिए थी। मुनादी कराकर मजदूरों को बुलाना और घंटों इंतजार कराने के बाद वापस भेज देना ग्रामीणों के साथ अन्याय है। इससे मजदूरों का समय और मजदूरी दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

गांव के लोगों का आरोप है कि मनरेगा कार्य में पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। कुछ चुनिंदा लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है जबकि वास्तविक जरूरतमंद मजदूरों को काम से वंचित किया जा रहा है। इस वजह से गांव में असंतोष बढ़ता जा रहा है और पंचायत की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।

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सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ग्रामीण स्वयं काम मांगने कार्यस्थल पहुंच रहे हैं तो फिर उन्हें रोजगार क्यों नहीं दिया जा रहा। मनरेगा कानून के तहत रोजगार मांगने वाले पात्र मजदूरों को काम उपलब्ध कराना पंचायत और प्रशासन की जिम्मेदारी है। इसके बावजूद यदि मजदूरों को बार-बार लौटाया जा रहा है तो यह योजना के मूल उद्देश्य पर ही सवाल खड़ा करता है।

ग्रामीणों ने जनपद पंचायत, जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों से मामले की जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। साथ ही सभी पात्र मजदूरों को तत्काल मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे जनपद पंचायत और जिला प्रशासन के समक्ष सामूहिक शिकायत कर आंदोलन का रास्ता भी अपना सकते हैं। घोटवानी में मनरेगा को लेकर बढ़ता यह विवाद अब पंचायत से निकलकर प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

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