Edited By Himansh sharma, Updated: 31 May, 2026 02:04 PM

राजनीति में अक्सर विरोधी दलों के बीच मतभेद देखने को मिलते हैं, लेकिन कभी-कभी एक घटना ऐसी भी होती है जो विपक्ष के भीतर ही अलग-अलग विचारधाराओं की तस्वीर सामने ले आती है।
रायपुर: राजनीति में अक्सर विरोधी दलों के बीच मतभेद देखने को मिलते हैं, लेकिन कभी-कभी एक घटना ऐसी भी होती है जो विपक्ष के भीतर ही अलग-अलग विचारधाराओं की तस्वीर सामने ले आती है। छत्तीसगढ़ में भाजपा विधायक दीपेश साहू की मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत होने जा रही शादी ने कुछ ऐसा ही माहौल बना दिया है। एक ओर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज इस पूरे मामले को गरीबों के अधिकारों और सरकारी योजनाओं की पात्रता से जोड़कर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस की ही नेता दीप्ति दुबे इसे सादगी, संस्कार और सामाजिक समरसता का प्रतीक बता रही हैं। यही विरोधाभास इस मामले को महज एक शादी नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का विषय बना देता है।
दरअसल, मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों के विवाह में सहयोग करना है। ऐसे में जब एक विधायक इस योजना के तहत विवाह करने जा रहा है, तो स्वाभाविक रूप से पात्रता और नैतिकता को लेकर प्रश्न खड़े होना तय हैं। कांग्रेस अध्यक्ष का तर्क है कि जनता के पैसे से संचालित योजनाओं का लाभ केवल उन्हीं तक सीमित रहना चाहिए, जिनके लिए वे बनाई गई हैं। हालांकि विधायक दीपेश साहू का पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उनका कहना है कि योजना की पात्रता दूल्हे की आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि लड़की के परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति से तय होती है। यदि होने वाली दुल्हन बीपीएल परिवार से है और सभी नियमों का पालन किया गया है, तो योजना के तहत विवाह करना पूरी तरह वैध है।
इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी है। आज जब राजनीति में भव्य आयोजनों और करोड़ों रुपये खर्च होने वाली शादियों की चर्चा होती है, ऐसे समय में एक जनप्रतिनिधि का सामूहिक विवाह समारोह में सात फेरे लेना कुछ लोगों को सकारात्मक संदेश भी देता है। यही वजह है कि कांग्रेस की नेता दीप्ति दुबे ने इसे सादगी और सामाजिक समानता की मिसाल बताया है।असल सवाल यह नहीं है कि विधायक की शादी सामूहिक विवाह में क्यों हो रही है। असल सवाल यह है कि क्या योजना के नियमों का पूरी तरह पालन हुआ है? यदि जवाब हां है, तो विवाद की गुंजाइश सीमित हो जाती है। लेकिन यदि नियमों की अनदेखी हुई है, तो फिर विपक्ष के सवाल भी जायज माने जाएंगे।
31 मई को बेमेतरा में होने वाला यह विवाह अब सिर्फ एक निजी समारोह नहीं रह गया है। यह एक ऐसा राजनीतिक प्रसंग बन चुका है, जिसने योजनाओं की पारदर्शिता, सामाजिक न्याय और राजनीतिक नैतिकता पर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुद्दा विवाह मंडप तक सीमित रहता है या फिर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक गूंजता है।