Edited By meena, Updated: 30 May, 2026 02:21 PM

मध्य प्रदेश के मंडला में कान्हा की देश दुनिया में अलग पहचान है। इस पहचान को लोगों तक पहुंचाने वाले हेमेंद्र सिंह पवार ने दुनिया को अलविदा कह दिया है। जैसे ही यह खबर फैली मानों कान्हा की वादियों में जंगल
मंडला (अरविंद सोनी) : मध्य प्रदेश के मंडला में कान्हा की देश दुनिया में अलग पहचान है। इस पहचान को लोगों तक पहुंचाने वाले हेमेंद्र सिंह पवार ने दुनिया को अलविदा कह दिया है। जैसे ही यह खबर फैली मानों कान्हा की वादियों में जंगल की चिर-परिचित चहचहाहट भी मानो खामोश थी। कान्हा टाइगर रिजर्व के सृजनकर्ता, विश्वविख्यात वन्यजीव विशेषज्ञ और पद्म विभूषण से सम्मानित स्वर्गीय हेमेंद्र सिंह पंवार को श्रद्धांजलि देने के लिए गाइड, जिप्सी चालक और स्थानीय लोग एक कतार में खड़े होकर मौन नमन कर रहे थे। यह केवल एक श्रद्धांजलि नहीं थी, बल्कि उस व्यक्तित्व के प्रति कृतज्ञता का भाव था, जिसने कान्हा को विश्व मानचित्र पर एक नई पहचान दिलाई।

खटिया गेट के सामने आज सन्नाटा भी शोक में डूबा हुआ प्रतीत हो रहा था। गाइडों और जिप्सी चालकों की नम आंखें उस महान व्यक्तित्व को याद कर रही थीं, जिसने न केवल जंगल और वन्यजीवों की रक्षा की, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन में सम्मान और रोजगार की रोशनी भी पहुंचाई।
1974 से 1981 तक रहे कान्हा टाइगर रिजर्व के पद पर रहे हेमेंद्र सिंह पंवार वह नाम थे, जिन्होंने कान्हा के जंगलों को सिर्फ संरक्षित नहीं किया, बल्कि उन्हें दुनिया के सामने प्रकृति संरक्षण के आदर्श मॉडल के रूप में स्थापित किया। उनकी दूरदर्शिता और अथक प्रयासों ने कान्हा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

बाघों की गर्जना, बारहसिंघों की छलांग और जंगल की हर सांस में आज भी उनके सपनों की गूंज सुनाई देती है। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और प्रकृति के प्रति जनजागरण को समर्पित कर दिया।

कान्हा से जुड़े लोगों का कहना है कि पंवार साहब ने इस क्षेत्र के लोगों को केवल रोजगार ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें एक नई पहचान और गौरव का एहसास भी कराया। यही कारण है कि उनके निधन की खबर ने पूरे क्षेत्र को गहरे शोक में डुबो दिया है। श्रद्धांजलि सभा के दौरान कई लोगों की आंखों से आंसू छलक पड़े। हर व्यक्ति के मन में उनकी स्मृतियां और उनके द्वारा किए गए कार्यों की छाप स्पष्ट दिखाई दे रही थी। मौन के उन पलों में केवल एक ही भावना थी,एक ऐसे प्रकृति पुरुष को अंतिम प्रणाम, जिसने अपना जीवन जंगलों और वन्यजीवों के नाम कर दिया।

आज कान्हा का जंगल अपने सबसे बड़े संरक्षक को याद कर रहा है। पेड़ों की सरसराहट, पक्षियों की आवाजें और जंगल की हर पगडंडी मानो यही कह रही है कि व्यक्ति भले ही इस दुनिया से चला जाए, लेकिन उसके द्वारा किए गए कार्य और उसकी विरासत सदैव जीवित रहती है। ईश्वर दिवंगत पुण्य आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिवार को यह असीम दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें।